• July 14, 2020

पश्चिमी देशों में चल रहा है मेडिटेशन का कोर्स, मिल रही है ध्यान-साधना में डिग्री

भारत की पारंपरिक आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में इसीलिए योग और ध्यान का भी अभिन्न स्थान है. किंतु पश्चिम की कथित वैज्ञानिक शोधों पर आधारित आधुनिक चिकित्सा पद्धति में आयुर्वेद, योग और ध्यान को न केवल अज्ञान बता कर उनकी खिल्ली उड़ायी जाती रही, उन्हें अंधविश्वास तक कहा जाता रहा. भारत में भी यही धारणा बन गयी कि सच्चा चिकित्सा विज्ञान तो वही है, जो पश्चिम से आया है. ऋषि-मुनी भला क्या जानें विज्ञान की बातें!

उसी पश्चिम की प्रयोगशालाओं में ध्यानसाधना का अभ्यास अब हठयोग या धर्म के दायरे से बाहर निकल कर चिकित्सा विज्ञान में नयी खोजों का बहुचर्चित विषय बन गया है. मनोवैज्ञानिक (साइकोलॉजिस्ट), तंत्रिका वैज्ञानिक (न्यूरोलॉजिस्ट) और आणविक जीववैज्ञानिक (मॉलेक्युलर बायॉलॉजिस्ट) जानने में लगे हुए हैं कि ध्यानयोग का मानवीय तन और मन पर क्या प्रभाव पड़ता है? उससे कौन सी बीमारियां ठीक की जा सकती हैं?

ऐसे प्रयोगों में मिली आश्चर्यजनक सफलताओं से यूरोप और अमोरिका के कई अस्पतालों में योग और ध्यान का भी नियमित अभ्यास करवाया जाने लगा है. वैज्ञानिक ध्यानावस्था की उन जैविक क्रियाओं को अब बेहतर समझने लगे हैं, जिनकी किसी बीमारी के उपचार में प्रमुख भूमिका होती है. उन्होंने पाया है कि ध्यानसाधना हमारे मस्तिष्क और स्वास्थ्य पर बहुत ही अनुकूल प्रभाव डालती है.

साक्षीभाव या विपश्यना ध्यान या माइन्डफुलनेस मेडिटेशन

बीमारियों के नये उपचारों की खोज कर रहे पश्चिमी चिकित्सक और वैज्ञानिक अब मानने लगे हैं कि ध्यान और चिकित्सा विज्ञान ‘’एक ही सिक्के के दो पहलू’’ हैं. उन डॉक्टरों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, जो स्वस्थ रहने की प्राचीन भारतीय विधियों को भी अपनी उपचार योजना में शामिल करने लगे हैं.

किंतु एक दुराव अब भी बना हुआ है  भारतीय ऋषियोंमुनियों के आश्रमों वाला ध्यानसाधना का आध्यात्मिक पक्ष इन डॉक्टरों की वैज्ञानिकता को स्वीकार्य नहीं है. सारी दिलचस्पी केवल उसकी चिकित्सकीय उपयोगिता में है. इन शोधकों-चिकित्सकों का कहना है कि आध्यात्मिक प्रभामंडल से मुक्त किये बिना मेडिटेशन को अन्य धर्मावलंबियों और नास्तिकों के लिए स्वीकार्य नहीं बनाया जा सकता. योगाभ्यास को सब के लिए स्वीकार्य बनाने में भी प्रायः ऐसा ही करना पड़ता है.

चिकित्सकीय उपयोग के लिए यूरोप और अमेरिका के डॉक्टर और वैज्ञानिक ध्यानसाधना की जिस विधि को अपनाते हैं, उसे साक्षीभाव या विपश्यना ध्यान (माइन्डफुलनेस मेडिटेशन) कहा जाता है. इस विधि में व्यक्ति को किसी वस्तु या कार्य के प्रति  व्यवहारतः अपने भीतर आती-जाती सांस के प्रति  पूरी तरह सचेत रहते हुए एकाग्रचित्त होना पड़ता है. यह भी हो सकता है कि व्यक्ति से कहा जाये कि वह मन-ही-मन अपने भीतर जाये. शरीर के भीतर की सबसे गहरी संवेदनाओं को एकाग्रचित्त होकर महसूस करे.

पेरिस में ‘साँ अन’ अस्पताल के डॉ. क्रिस्टोफ़ आंद्रे ने जर्मन-फ्रांसीसी टीवी चैनल ‘आर्टे’ के एक कार्यक्रम में कहा, ‘’ध्यान लगाना शुरू करने से पहले अधिकतर लोग जानते ही नहीं कि मेडिटेशन एक शारीरिक अनुभूति भी है. ध्यानावस्था में हम सुन सकते हैं कि हमारे शरीर के भीतर क्या हो रहा है. हम कैसे सांस ले रहे हैं. विचार कैसे प्रवाहित हो रहे हैं. यानी हम वस्तुतः अपने आप को ही देख-सुन रहे एक मौन प्रेक्षक होते हैं.’’

मानसिक रोगों के उपचार में घ्यान की भूमिका

डॉ. आंद्रे ने ध्यानधारण के बारे में कई पुस्तकें तो लिखी ही हैं, वे फ्रांस के ऐसे पहले डॉक्टर भी हैं, जिसने ध्यान का रोगोपचार के लिए उपयोग किया है. अपने अस्पताल में वे कम से कम डेढ़ दशक से विषाद (डिप्रेशन) और भय के लंबे समय के मानसिक रोगियों के उपचार में ध्यान का उपयोग कर रहे हैं. रोगियों को दी जाने वाली दवाओं से जब बात नहीं बनती, तब वे उन्हें साक्षीभाव ध्यान लगाना सिखाते हैं. रोगियों को आठ सप्ताहों तक घर पर अभ्यास करना और बातचीत के लिए सप्ताह में एक बार अस्पताल में जाना होता है.

यूरोप और अमेरिका के अस्पतालों में हुए अध्ययन भी डॉ. आंद्रे के कथन की पुष्टि करते हैं. इन अध्ययनों में पाया गया है कि विषाद के दो गंभीर दौर झेल चुके लोग, प्रतिदिन केवल 20 मिनट ध्यानसाधना के बाद, दुबारा ऐसा होने का ख़तरा 50 प्रतिशत तक घटा सकते हैं.

फ़्रांस की ही तंत्रिका वैज्ञानिक डॉ. गायेल देवार्त ने  बोस्टन, अमेरिका में  मस्तिष्क के एक ऐसे हिस्से में, जिसकी मनोदशा (मूड) और भय के समय बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका हुआ करती है, ध्यानसाधना के प्रभावों का अध्ययन किया है. भाषा और ध्वनि को चित्र-रूप देने वाले मस्तिष्क के टेम्पोरल लॉब (शंखपाली) के अग्रभाग में स्थित इस हिस्से को अमिग्दला कहा जाता है. हमारी भावनाओं का वशीकरण सामान्यतः अमिग्दला में ही होता है.

डॉ. गायेल देवार्त के अनुसार, अमिग्दला को हमारी भावनाओं का केंद्र होने के कारण हमारे भय का केंद्र भी माना जाता है. जो लोग भय-विकार या मानसिक आघात से पीड़ित होते हैं, उनकी अमिग्दला की सक्रियता एवं आकार बढ़ जाता है. मेडिटेशन के द्वारा इसे घटाया जा सकता है. डॉ. देवार्त ने इससे पीड़ितों के लिए आठ सप्ताह का एक ध्यानसाधना कोर्स रचा. कोर्स के आरंभ व अंत में ‘एमआरटी’ द्वारा प्रतिभागियों के मस्तिष्क के स्कैन-चित्र लिये. डॉ. देवार्त ने पाया कि कोर्स के बाद अमिग्दला की सक्रियता सचमुच घट गयी थी. यानी ध्यानसाधना से मस्तिष्क की – या कम से कम हमारे स्वास्थ्य के लिए उपयोगी उसके कुछ भागों की – बनावट अनुकूल ढंग से बदली जा सकती है.

डॉ. गायेल देवार्त को आशा है कि उनकी शोध-परियोजना के अंत में जब सारे परिणाम आ जायेंगे, तब अवसाद-विषाद के पीड़ितों को पूरी तरह ठीक करना भी संभव हो जायेगा. तब यह पता चल जायेगा कि मस्तिष्क में पैदा हो गये कतिपय विकारों को मस्तिष्क द्वारा स्वयं ही दूर करने के लिए उसे किस तरह से साधा जाना चाहिये. ‘एमआरटी’ (मैग्नेटिक रेज़ोनैन्स टोमोग्राफ) स्कैन दिखाते हैं कि ध्यानसाधना के अभ्यास से मस्तिष्क की कार्यक्षमता अथवा बनावट में दीर्घकालिक परिवर्तन भी लाये जा सकते हैं.

तंत्रिकाविज्ञान के इन अध्ययनों का मूल उद्देश्य ऐसे तथ्य और आंकड़े जुटाना है, जो ध्यान में छिपी रोगनिवारक शक्ति की पुष्टि कर सकें. वैज्ञानिक यह भी जानना चाहते हैं कि वे कौन-सी क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं हैं, जिन्हें जानने-समझने के बाद ध्यानसाधना को संभवतः एक विज्ञानसम्मत मान्यताप्राप्त उपचारविधि घोषित किया जा सकता है. अभी यह भी जानना बाक़ी है कि रोगियों को कितनी देर तक ध्यान लगाना चाहिये. ध्यान लगाने के लिए उन्हें प्रतिदिन बैठना चाहिये, या किसी निश्चित अवधि तक ही उन्हें ध्यान लगाना चाहिये.

न्यूरोप्लस्टिसिटी

कुछ दूसरे अध्ययनों में देखा गया है कि नियमित रूप से आजीवन ध्यानसाधना करने से मस्तिष्क में इतने सारे परिवर्तन होते हैं कि उनकी पहचान और गिनती करना बहुत कठिन है. ऐसा बिल्कुल नहीं है कि ध्यानावस्था में मस्तिष्क सर्वथा निष्क्रिय होता है. अमेरिका में विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर रिचर्ड डेविडसन का कहना है कि ध्यानावस्था में मस्तिष्क की तंत्रिकाओं में एक ऐसी गतिविधि शुरू हो जाती है, जिसे ‘न्यूरोप्लस्टिसिटी’ कहा जाता है.

‘न्यूरोप्लस्टिसिटी’ मस्तिष्क की, पिछले अनुभवों और अभ्यासों के आधार पर, अपने आप को स्वयं ही बदलने की क्षमता है. प्रोफ़ेसर डेविडसन के अनुसार, हमारा मस्तिष्क अधिकतर समय बाहरी प्रभावों से निपटने में ही व्यस्त रहता है. मेडिटेशन ही वह अवस्था है, जब मस्तिष्क अपने आप को स्वयं व्यवस्थित कर सकता है. ध्यानसाधना और कुछ नहीं, अपने चंचल मन को साधने की विधि है.

पश्चिमी देशों में पिछले 20 वर्षों से ध्यानसाधना संबंधी पुस्तकों तथा पत्र-पत्रिकाओं में लेखों आदि की झड़ी लग गयी है. अकेले अमेरिका में ही ढाई सौ से अधिक ऐसे क्लीनिक और अस्पताल हैं, जहां रोगियों के लिए ध्यानसाधना के आरंभिक कोर्स चलाये जा रहे हैं.

सबसे चर्चित कोर्स यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैसैच्यूसेट्स के चिकित्सा विज्ञान विभाग की ओर चलाया जा रहा है. इन कोर्सों में प्रायः ऐसी अभ्यास-विधियां सिखायी जाती हैं, जो भारत में प्रचलित विधियों से बहुत अलग हैं. लोग मंदगति से चलते-फिरते, हाथ-पैर खींचते-तानते, उकडूं बैठे या लेटे हुए तरह-तरह की गतिविधियां करते दिखते हैं.

शारीरिक स्वास्थ्य दिमाग़ में शुरू होता है

 

साक्षीभाव ध्यानसाधना इस ज्ञान को विज्ञान प्रमाणित कर रही है कि शारीरिक स्वास्थ्य दिमाग़ में शुरू होता है. बीमारी कोई भी हो, उसके इलाज़ की सफलता-विफलता में मन की दशा निर्णायक होती है. पेरिस के ‘पिप्ये सौं पेत्रियेख़’ अस्पताल में प्रो. कोरीं इनार-बानीस नेफ्रोलॉजी (मूत्रविसर्जन प्रणाली), हृदयरोग और कैंसर के रोगियों की देखभाल करती हैं. इन रोगियों के बहुत ही कष्टदायक उपचार को यथासंभव सहनीय बनाने के लिए वे ध्यानसाधना का सहारा लेती हैं. उनका कहना है कि उनके मरीज़ उन्हें अक्सर बताते हैं कि ध्यानसाधना की कृपा से वे अपने शरीर के ऐसे कई अंगों को भी अनुभव करने लगे हैं, जिनके प्रति वे पहले अनजान थे. इस अनुभव के बाद वे अपने उपचार में सक्रिय सहयोग देने लगते हैं. लंबी बीमारी वाले रोगियों को अपनी बीमारी से छुटकारा पाने में तब मदद मिलती है, जब वे लक्षणों को समझना, अपने शरीर की प्रतिक्रय़ाओं को वश में करना और कोई दर्द उठने से पहले ही उससे बचाव करना सीख लेते हैं.

अब तक की सबसे बड़ी शोध परियोजना

सन 2000 के आरंभ में अमेरिका में कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के प्रो. क्लिफ़र्ड सैरन की एक टीम ने ध्यानसाधकों के शरीर और मस्तिष्क पर उनकी साधना के प्रभावों को व्यवस्थित ढंग से दर्ज करना शुरू किया. ध्यानसाधना और स्वास्थ्य के बीच संबंधों की वह अब तक की सबसे बड़ी शोध परियोजना थी. 30-30 लोगों के दो ग्रुप बनाये गये. उन में से एक को रॉकी माउन्टेन में स्थित एक मकान में तीन महीनों तक ध्यानसाधना करनी थी. भावावेशों के विभिन्न पक्षों को जानने के लिए कंप्यूटर आधारित विविध प्रकार के 15 कार्य तैयार किये गये थे.

शोधकों की टीम में आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) और आणविक जीवविज्ञान जैसे विभिन्न क्षेत्रों के वैज्ञानिकों को शामिल किया गया था. पहली बार इस प्रश्न का उत्तर भी खोजा गया कि ध्यान क्या हमारे शरीर की असंख्य कोशिकाओं को भी प्रभावित करता है? कैलिफ़ोर्निया में हुए इस अध्ययन से पहले कोई शोधक यह नहीं दिखा सका था कि किसी कोशिका के केंद्रक की कार्यविधि को भी ध्यानसाधना की मानसिक शक्ति से प्रभावित किया जा सकता है. इसे नितांत अविश्वसनीय माना जाता था कि ध्यानसाधना से हमारे शरीर की एक-लाख-अरब कोशिकाओं के हर केंद्रक में स्थित डीएनए भी प्रभावित होता है.

फ्रांसीसी विश्वविद्यालय देता है ध्यानसाधना की डिग्री

इन शोधकार्यों का ही फल है कि पश्चिम के अधिकाधिक डॉक्टर भी अब योग-ध्यान की ओर झुकने और उसे सीखने लगे हैं. फ्रांस का श्त्रासबुर्ग विश्वविद्यालय ध्यानसाधना की डिग्री तक देने लगा है. डॉक्टर जौं-जेरार्द ब्लोख़ इस डिग्री के लिए पढ़ाई करने वालों डॉक्टरों और मनोरोग चिकित्सकों को ध्यानसाधना का अभ्यास कराते हैं. वे कहते हैं, ‘’लंबे समय तक मेडिकल विषयों वाले विभाग एक-दूसरे से अलग रहे हैं. सभी जानते थे कि यह पृथकता बनावटी है. आजकल इन बनावटी सीमाओं के आर-पार एक सर्वांगी चिकित्सा विज्ञान उभरने लगा है. तन और मन, दोनों के इस मेल को मैं जीवन-विज्ञान की संज्ञा देता हूं.’’ कह सकते हैं कि पश्चिम में मशीन की प्रधानता वाले तकनीकी चिकित्सा विज्ञान में अपूर्व प्रगति के बाद अब एक मानवीय चिकित्सा विज्ञान के संवेदनशील युग का सूर्योदय हो रहा है.

विज्ञान अंततः पुष्टि करने लगा है कि ध्यानसाधना और योगाभ्यास का हमारे जीनों तथा असंख्य कोशिकाओं तक पर बहुत ही हितकारी प्रभाव पड़ता है. ध्यानयोग भी एक विज्ञान है, न कि कोई तंत्र-मंत्र, गूढ़ज्ञान या बकवास. भारत के ऋषियों-मुनियों ने सुखी और दीर्घायु होने की अपनी खोजें, बिना किसी प्रयोगशाला के, प्रकृति के अवलोकन, चिंतन-मनन और तपस्या के बल पर की थीं.

खेद इसी बात का है कि भारत के इस प्राचीन विज्ञान को भारत के ही एक धर्म विशेष से जोड़ कर देश-विदेश में या तो नकारा या फिर धर्मनिरपेक्षता की सूली पर चढ़ा दिया जाता है.

लोग रासायनिक दवाओं के लिए गाढ़े पसीने की कमाई लुटाते हैं, पर उन पूर्वजों से सीख नहीं लेते जो मात्र योग-ध्यान और शाकाहार से शतायु हुआ करते थे.

 

Read Previous

जगन्नाथपुरी में रथयात्रा तो होती है, लेकिन क्यों होती है ? क्या कुछ खास है इस यात्रा में, जानने के लिए खबर को पूरा पढ़े

Read Next

दोस्त संदीप सिंह ‘वंदे भारतम’ से देंगे सुशांत सिंह राजपूत को ट्रिब्यूट