• July 14, 2020

Success Story: नींबू के बीमार पौधे का करने लगे इलाज फिर हुआ कुछ ऐसा कि खुद किसान बन गए डॉक्टर पति-पत्नी

THE INDIA RISE
कभी-कभी एक छोटी सी कोशिश जिंदगी में बहुत बड़े बदलाव की वजह बन जाती है। विकास वर्मा और सुमन वर्मा के होम्योपैथिक डॉक्टर से किसान बनने की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। शहर के पॉश इलाके में क्लीनिक चला रहे पति-पत्नी घर के बाहर बीमार पड़े नीबू के पौधे को देखकर कुछ देर के लिए ठिठक जाते थे। एक दिन बैठे-बैठे मन में विचार आया कि अगर होम्योपैथी से इंसान ठीक हो सकता है तो फिर पेड़-पौधे क्यों नहीं? दोनों ने पौधे का इलाज शुरू किया। जिस पेड़ पर पांच साल में एक भी फल नहीं आया था। वह इलाज शुरू होने के बाद फलों से लकदक हो गया। इसके बाद बीमार पौधों का इलाज करते-करते दोनों खुद किसान बन गए। पीलीभीत में अपना कृषि फार्म खोलकर अलग-अलग प्रजाति के बीमार पौधों का इलाज करके कई किसानों की जिंदगी बदली। फिलहाल यह दंपत्ति सात प्रदेशों के किसानों की फसलों को बीमारियों से बचाने में मदद कर रहे हैं।

dr vikas and dr suman
डॉक्टर विकास वर्मा और उनकी पत्नी डॉक्टरर सुमन वर्मा

मूलरूप से पीलीभीत शहर के रहने वाले डॉ. विकास वर्मा अपने परिवार के साथ नॉर्थ सिटी एक्सटेंशन कालोनी में रहते हैं। डॉ. विकास वर्मा और उनकी पत्नी डॉ. सुमन वर्मा पेशे से होम्योपैथिक डॉक्टर हैं। दोनों बीडीए कॉंपलेक्स में अपना क्लीनिक चलाते हैं। डॉ. विकास ने बताया, हमारे घर के बाहर एक नींबू का पेड़ था। उसमें नींबू नहीं आते थे। बाजार में उपलब्ध हर खाद डालकर देखी मगर पेड़ पर फूल नहीं आए। होम्योपैथी से इलाज किया तो पेड़ पर अगले ही सीजन में ढेरों नींबू आ गए।

नींबू के पेड़ का इलाज करने के बाद मैंने अखबार में पड़ा कि रामगंगा किनारे सैकड़ों बीघा मिर्च के फसल पर घुमना रोग (लीफकर्ल वायरस) लग गया है। मैं पता पूछता हुआ उन किसानों के पास पहुंचा। किसान फसल नष्ट करने की तैयारी कर रहे थे। मैंने उनसे गुजारिश की कि मुझे केवल 15 दिन बीमार फसल का इलाज करने दें। नतीजे मेरे लिए भी चौंकाने वाले थे। होम्योपैथिक दवाओं से घुमना रोग जाता रहा और मिर्च की बंपर पैदावार हुई। इसके बाद भुता में पेठा और रामगंगा किनारे बसे एक गांव में सरसों की बीमार फसल का इलाज किया। यहां भी नतीजे बहुत अच्छे आए।
DR VIKAS VERMA 1
अपना फार्म खोलकर पौधों पर शुरू किया प्रयोग
पौधों के होम्योपैथिक इलाज से चौंकाने वाले नतीजे आ रहे थे। बरेली के साथ दूसरे इलाकों के किसान भी मदद के लिए हमारे पास पहुंचने लगे थे। ऐसे में हमने पौधों पर प्रयोग के लिए पीलीभीत के खमरिया पुल के पास अपना फार्म खरीदा और यहां अलग-अलग पौधों पर शोध शुरू किया। कहीं भी पौधों की बीमारी की सूचना मिलने पर मैं वहां पहुंचता और किसानों से अनुमति लेकर उनका इलाज शुरू कर देता। धीरे-धीरे हम दोनों का भरोसा जमता गया और हमने किसानों को इलाज के नुस्खे बताने शुरू कर दिए।

मध्य प्रदेश के किसान पहुंचे मदद मांगे
मैंने होम्योपैथी से फसलों का इलाज शुरू किया तो यह बात किसानों के बीच तेजी से फैलने लगी। तब मेरे पास मध्य प्रदेश के रायपुर से किसान आए। उनकी 4000 एकड़ में लगी टमाटर की फसल में कीड़ा लग गया था। मैंने प्रयोग के तौर पर टमाटर की फसल का इलाज शुरू किया। कुछ ही दिनों में कीड़ा मर गया और टमाटर की फसल बच गई। अब मेरे पास यूपी के तमाम जिलों के साथ-साथ छह से अधिक प्रदेशों के किसान आ रहे हैं।
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इंसानों की तरह व्यवहार करते हैं पौधे
डॉ. विकास वर्मा ने बताया कि पौधे इंसानों की तरह व्यवहार करते हैं। बीमार होने पर वह हमें पूरे संकेत देते हैं। हम उनके संकेत नहीं पहचान पाते और पौधे दम तोड़ देते हैं। पिछले करीब 10 बरसों में मैंने पेड़ पौधों की भाषा को पढ़ना सीख लिया है। बीमार पौधों की जांच करने के बाद मैं उन्हें उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की दवा देता हूं। पौधा पूरी ताकत से रोग से लड़ता है और बीमारी से बाहर निकल आता है। ऐसे में पैदावार भी बंपर होती है।

पेस्टीसाइड्स से बेहद सस्ती है होम्योपैथी दवा
उन्होंने बताया कि पौधों की बीमारियां दूर करने के लिए इस्तेमाल हो रही होम्योपैथी की दवाएं पेस्टीसाइड्स से बेहद सस्ती हैं। इनका पेड़ पौधों और इंसानों पर कोई हानिकारक प्रभाव भी नहीं पड़ता। इन दवाओं से पौधों की किसी भी बीमारी से लड़ा जा सकता है। ये दवाएं असर भी तुरंत करती हैं। मगर बाजारवाद के दौर में आम किसान पौधों के इलाज की इस पद्वति पर धीरे-धीरे भरोसा कर रहे हैं। उन्हें डर लगता है कि कहीं दवा डालने के बाद भी नुकसान हो गया तो क्या करेंगे।

कई प्रदेशों के किसानों की कर रहे मदद
डॉ. सुमन ने बताया कि उत्तर प्रदेश के अलावा मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजराज, राजस्थान, उत्तराखंड, विशाखापत्तनम के किसान भी हमारे पास अपनी समस्याएं लेकर पहुंचते हैं। कई बार किसान खुद न आकर केवल फोन पर संपर्क करते हैं तो हम उन्हें दवाएं बता देते हैं। कुछ दिन के इलाज के बाद किसानों का थैक्स नोट आता है। यह हमारे के लिए काफी सुकून देने वाला होता है।

फार्म पर एक साथ उगा रहे कई फसलें
डॉ. विकास ने बताया कि अब किसानों को एक ही समय में बहुत सी फसलें करने के बारे में सोचना होगा। मैं अपने फार्म पर लहसुन, हल्दी, अदरक, शतावर, गेंदा, मटर, अल्सी, प्याज, सरसों, आलू की फसल एक साथ कर रहा हूं। पति-पत्नी रोजाना कम से कम दो घंटे अपने फार्म पर जरूर देते हैं। किसान अक्सर बीमार पौधों को सैंपल के तौर पर लेकर हमारे फार्म में पहुंचते हैं। हम वहीं पौधों का इलाज भी करते हैं।
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देश के हर किसान तक पहुंचाना चाहते हैं तकनीक
डॉ. विकास वर्मा और डॉ. सुमन वर्मा ने बताया कि वो दोनों पेड़-पौधों की बीमारियों के इलाज की होम्योपैथिक तकनीक को देश के हर किसान तक पहुंचाना चाहते हैं। दवाओं की कीमत कम होने के कारण इन्हें छोटे और मझोले किसान भी आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं। दोनों ने बीमार पौधों और फसलों पर अब तक जितने भी प्रयोग किए हैं, वे सभी सफल रहे हैं। फिलहाल पति-पत्नी किसानों को मुफ्त में दवा बांट रहे हैं।

दो किलो के अमरुद वाले डॉक्टर साहब के नाम से हैं मशहूर
फसलों के साथ अपने फार्म पर आम, अमरुद, पपीता और केले की खेती कर रहे डॉ. विकास वर्मा को आम लोग दो किलो के अमरुद वाले डॉक्टर साहब के बारे में जानते हैं। वह बरेली मंडल में सबसे पहले थाईलैंड के अमरूद की डेढ़ से दो किलो वाली वैरायटी लेकर आए थे। उन्होंने बताया, होम्योपैथिक दवाओं की मदद से हम पौष्टिक अमरुद तैयार करते हैं। इसकी बरेली के साथ दूसरे शहरों में भी बड़ी मांग है।

पेड़-पौधे इंसानों की तरह हर अच्छी बुरी चीज को महसूस करते हैं। वो बीमार होते हैं और हमें संकेत भी देते हैं। हमें इन संकेतों को समझकर समय पर उनका इलाज करना होता है। मैंने करीब 10 बरस पहले पेड़-पौधों का होम्योपैथी से इलाज शुरू किया था। आज मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि यह बीमार पौधों के इलाज की सबसे कारगर विधि है। मैं इसे देश के हर किसान तक पहुंचाना चाहता हूं। वह भी निशुल्क।
–डॉ. विकास वर्मा, होम्योपैथिक चिकित्सक व प्रगतिशील किसान

इस दौर में जब बाजार में मिल रही खाने पीने की चीजों में भारी मात्रा में पेस्टीसाइड़स मिले हुए हैं, होम्योपैथी वाकई पौधों के इलाज की बेहद कारगर विधि है। इससे न तो पौधों पर कोई असर होता है न फसल व फल खाने वाले इंसानों पर। हमने जब पौधों का इलाज शुरू किया था तो हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल था कि हम पर भरोसा कौन करेगा। मगर प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत नहीं होती। किसानों ने खुद नतीजे देखे और वो हमसे जुड़ते गए।
–डॉ. सुमन वर्मा, होम्योपैथिक चिकित्सक और प्रगतिशील किसान

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